वो कामकाजी औरत
घर और समाज में
समानता का बोझ
अपने कंधे पर उठाये
स्कूलों ,दफ्तरों,
और समाज में अपनी
प्रतिभा बिखेरती है .
वो कामकाजी औरत
दिखती है गिट्टी तोड़ती
सड़कों से कचरा बीनती
दुधमुहें शिशु को परे रख
सर पर बोझ उठाती.
वो कामकाजी औरत
सहती है वासना
से भरी द्रष्टि
बचाती है समाज
के अस्तित्व को
फिर जानती है
एक पुरुष को
जो उघारता है
तन और मन
देता है नासूर
जो सालता है
उम्र दराज होने तक .
पूर्णिमा बाजपेयी
Sunday, November 14, 2010
Thursday, November 11, 2010
सृजन पथ
तुम्हारे सृजन का पथ
अगर मेरी आत्मा के
द्वार से गुजरता है
तो यह अजर- अमर
तुम्हारे सृजन को
सतत प्रवाहित सरिता बना
अपने में मिला लेगी .
तुम्हारे सृजन का पथ
मेरे ह्रदय के द्वार से
गुजरता है तो शब्दों को
प्रीति में डुबो माधुर्य
की लेखनी से सवार
आकंठ डूबी भावनाओं
का उपहार देगी.
तुम्हारे सृजन का पथ
मेरे गात से गुजरता है
तो इस शरीर को
तपोभूमि बना देह की
आग से तपा पूर्णता से
भर तुम्हारे सृजन को
अपरिमित होने का
अहसास देगी .
अगर मेरी आत्मा के
द्वार से गुजरता है
तो यह अजर- अमर
तुम्हारे सृजन को
सतत प्रवाहित सरिता बना
अपने में मिला लेगी .
तुम्हारे सृजन का पथ
मेरे ह्रदय के द्वार से
गुजरता है तो शब्दों को
प्रीति में डुबो माधुर्य
की लेखनी से सवार
आकंठ डूबी भावनाओं
का उपहार देगी.
तुम्हारे सृजन का पथ
मेरे गात से गुजरता है
तो इस शरीर को
तपोभूमि बना देह की
आग से तपा पूर्णता से
भर तुम्हारे सृजन को
अपरिमित होने का
अहसास देगी .
पूर्णिमा बाजपेयी
Wednesday, November 10, 2010
नारी: श्रष्टि का आधार
अपनी कोमल भावनाओं
निश्चल व्यवहार
दुनियावी पाखण्ड से दूर
तुम फिर छली गयी
क्यों तुमने अपनी आँखों पर
भावनावों का चश्मा
चढ़ा रखा है.
क्यों तुम बार-बार
लुटती हो, टूटती हो,बिखरती हो.
कभी न सिमटने के लिए
खुद को मानो ,जानो,पहचानो
भेड़ियों की भीड़ में
बकरी बन मिमियाने
से मिट जाओगी
सिंहनी बन दहाड़ो.
निश्चल व्यवहार
दुनियावी पाखण्ड से दूर
तुम फिर छली गयी
क्यों तुमने अपनी आँखों पर
भावनावों का चश्मा
चढ़ा रखा है.
क्यों तुम बार-बार
लुटती हो, टूटती हो,बिखरती हो.
कभी न सिमटने के लिए
खुद को मानो ,जानो,पहचानो
भेड़ियों की भीड़ में
बकरी बन मिमियाने
से मिट जाओगी
सिंहनी बन दहाड़ो.
पूर्णिमा बाजपेयी
बदनाम
तंग दिल
बजबजाती गलियाँ
भुतहे चेहरे
सभी कह रहे है
की मै बदनाम हो गयी हूँ.
मेरी कमजोर भावनाओं ,
आहत संवेगों ने
मुझे बदनामी की
दूकान बना दिया है.
चाहत के बाजार में
मैं प्रतिदिन बिकी हूँ .
उन भुतहे चेहरों की
सूखे होठों पर
लपलपाती जीभें
पूरे का पूरा खा
जाने वाली निगाहें
मुझमें ग्लानि नहीं जगाती
क्योंकि, मैंने
मन के बाजार में
चाहत की दूकान सजाकर
प्रेम की मुद्रा ले कर
देह की बेदी पर
एक लौ लगाई है .
मेरा तन और मन
मिलन स्थल है
उस क्षण का
जहां साड़ी कायनात से परे
एक शब्द गूजता है
प्रिय- प्रियतम- प्रेम
और तोड़ देता है बदनामी के
सारे मिथकों को.
बजबजाती गलियाँ
भुतहे चेहरे
सभी कह रहे है
की मै बदनाम हो गयी हूँ.
मेरी कमजोर भावनाओं ,
आहत संवेगों ने
मुझे बदनामी की
दूकान बना दिया है.
चाहत के बाजार में
मैं प्रतिदिन बिकी हूँ .
उन भुतहे चेहरों की
सूखे होठों पर
लपलपाती जीभें
पूरे का पूरा खा
जाने वाली निगाहें
मुझमें ग्लानि नहीं जगाती
क्योंकि, मैंने
मन के बाजार में
चाहत की दूकान सजाकर
प्रेम की मुद्रा ले कर
देह की बेदी पर
एक लौ लगाई है .
मेरा तन और मन
मिलन स्थल है
उस क्षण का
जहां साड़ी कायनात से परे
एक शब्द गूजता है
प्रिय- प्रियतम- प्रेम
और तोड़ देता है बदनामी के
सारे मिथकों को.
पूर्णिमा बाजपेयी
Wednesday, September 29, 2010
गाँधी बोले मैं आऊंगा
सत्य अहिंसा के नायक
सत्याग्रह के जो गायक
खुली पलक के स्वप्नद्वार से
आकर यूँ बोले मुझसे ,
मैं गाँधी भारत की आत्मा
मेरा अणु - अणु यहाँ व्याप्त है
मेरे सपनो का सत्य सकल
कण - कण यहाँ व्याप्त है .
स्थापित करने को रामराज्य
मैं पुनह एक दिन आऊंगा
संगीनों के साए में भटके
भारत की संवेदना जगाऊंगा .
आजादी के बाद देश की
हालत भी सवरी है ,
विज्ञान - ज्ञान संपन्न हुआ
गौरव - गरिमा भी निखरी है
पर सत्य अहिंसा दया
क्षमा के वादे टूटे है
इंसा के इंसा होने के
नेक इरादे टूटे है
मैं आऊंगा भेद मिटाने
मानवता का पाठ पढ़ाने
सत्याग्रह की अलख जगाने
भारत माँ का दर्द बटाने.
अणु और परमाणु युद्ध
मैं रोक सकूंगा
पुनः कहूँगा राम राम
हे राम| मगर भारत
अक्षुण है, भारत के
क्षय को रोक सकूंगा
ज्ञान और विज्ञान प्रबल हो
यह बिगुल बजाऊंगा
मैं गाँधी भारत की आत्मा
मैं पुनः एक दिन आऊंगा.
सत्याग्रह के जो गायक
खुली पलक के स्वप्नद्वार से
आकर यूँ बोले मुझसे ,
मैं गाँधी भारत की आत्मा
मेरा अणु - अणु यहाँ व्याप्त है
मेरे सपनो का सत्य सकल
कण - कण यहाँ व्याप्त है .
स्थापित करने को रामराज्य
मैं पुनह एक दिन आऊंगा
संगीनों के साए में भटके
भारत की संवेदना जगाऊंगा .
आजादी के बाद देश की
हालत भी सवरी है ,
विज्ञान - ज्ञान संपन्न हुआ
गौरव - गरिमा भी निखरी है
पर सत्य अहिंसा दया
क्षमा के वादे टूटे है
इंसा के इंसा होने के
नेक इरादे टूटे है
मैं आऊंगा भेद मिटाने
मानवता का पाठ पढ़ाने
सत्याग्रह की अलख जगाने
भारत माँ का दर्द बटाने.
अणु और परमाणु युद्ध
मैं रोक सकूंगा
पुनः कहूँगा राम राम
हे राम| मगर भारत
अक्षुण है, भारत के
क्षय को रोक सकूंगा
ज्ञान और विज्ञान प्रबल हो
यह बिगुल बजाऊंगा
मैं गाँधी भारत की आत्मा
मैं पुनः एक दिन आऊंगा.
पूर्णिमा बाजपेयी
Tuesday, September 28, 2010
२ अक्टूबर पर बापू को श्रद्धांजलि
कल राजघाट पर
प्रातः सैर करते करते
कुछ कदम चली,
अचानक एक दुबली पतली
काया सामने आकर खड़ी हो गई .
मैंने जरा गौर से देखा
अरे ये तो बापू है
मैं हुलस कर आगे बढ़ी
बोली बापू आप यहाँ कैसे ?
मैं गद-गद बापू मलिन,
उदासी और निराशा
की प्रतिमूर्ति,
दींन स्वर में बोले
बस अपने नौ निहालों से
मिलने चला आया .
की थी परिकल्पना
जिस रामराज्य की
उसे देखने चला आया
थोड़ा ठहर कर, बापू बोले
सोंचता हूँ कुछ दिन
यहीं ठहर जाऊं
अपने देश और देशवासिओं में
हिंसा के खिलाफ
अहिंसा का मंत्र
फिर फूंक जाऊं .
फिर रख जाऊं
रामराज्य की आधार- शिला
फिर से करूँ उदघोष
हिंसा से हमें क्या मिला.
मैंने कहा बापू
आज कोई
किसी की नहीं सुनता
सिर्फ अपने और
अपने लिए ही
हर कोई है
ताने -बाने बुनता .
मेरी माने तो बापू
आप वहीँ रहिये
यहाँ आयेगे तो पछतायेंगे
सत्कर्तव्य सत्यनिष्ठा
संस्कार स्वभाषा के
निधन पर आंसू बहाएगे.
कल राजघाट पर
प्रातः सैर करते करते
कुछ कदम चली,
अचानक एक दुबली पतली
काया सामने आकर खड़ी हो गई .
मैंने जरा गौर से देखा
अरे ये तो बापू है
मैं हुलस कर आगे बढ़ी
बोली बापू आप यहाँ कैसे ?
मैं गद-गद बापू मलिन,
उदासी और निराशा
की प्रतिमूर्ति,
दींन स्वर में बोले
बस अपने नौ निहालों से
मिलने चला आया .
की थी परिकल्पना
जिस रामराज्य की
उसे देखने चला आया
थोड़ा ठहर कर, बापू बोले
सोंचता हूँ कुछ दिन
यहीं ठहर जाऊं
अपने देश और देशवासिओं में
हिंसा के खिलाफ
अहिंसा का मंत्र
फिर फूंक जाऊं .
फिर रख जाऊं
रामराज्य की आधार- शिला
फिर से करूँ उदघोष
हिंसा से हमें क्या मिला.
मैंने कहा बापू
आज कोई
किसी की नहीं सुनता
सिर्फ अपने और
अपने लिए ही
हर कोई है
ताने -बाने बुनता .
मेरी माने तो बापू
आप वहीँ रहिये
यहाँ आयेगे तो पछतायेंगे
सत्कर्तव्य सत्यनिष्ठा
संस्कार स्वभाषा के
निधन पर आंसू बहाएगे.
पूर्णिमा बाजपेयी
Wednesday, September 15, 2010
हिंदी से हिंदुत्व और हिदुस्तान की शान है
आन बान शान और मान को बढाइये ,
देश हो विदेश दूर देश में भी बैठकर
मातु मातृभाषा मातृभूमि गुण गाईये .
सरल सुग्राह संतोष और सुख दे
बतरस रस घोले ह्रदय में उतारिये
हिंदी भाषा जनभाषा आम भाषा रूप है
ऐसी हिंदी भाषा पे सौ जन्मों को वारिये .
कबीरा ने बीज डाला तुलसी ने पानी दिया
सूरा संग हिंदी धीरे बड़ी हो गयी
भारत के इंदु भारतेंदु का आधार पाय
शैल सुता के समान हिंदी खड़ी हो गयी .
सूरज का ताप और चाँद की शीतलता
दोनों गुण एक हिंदी में ही पाईये
चिरजीवी चिरयुआ देववाणी महावाणी
ऐसी देवनागरी की लिपि अपनाईये.
हीन भावना मिटाओ खुद को बढाओ आगे
ज्ञान और विज्ञान के तर्क समझाइये
आदि गुरु आर्यभट हिंदु में बनाया बिंदु
बिंदु की महत्ता आज हिंदी में समझायिए
हिंदी से हिदुत्वा और हिन्दुस्तान की शान है
आन बान शान और मान को बढाइये.
आन बान शान और मान को बढाइये ,
देश हो विदेश दूर देश में भी बैठकर
मातु मातृभाषा मातृभूमि गुण गाईये .
सरल सुग्राह संतोष और सुख दे
बतरस रस घोले ह्रदय में उतारिये
हिंदी भाषा जनभाषा आम भाषा रूप है
ऐसी हिंदी भाषा पे सौ जन्मों को वारिये .
कबीरा ने बीज डाला तुलसी ने पानी दिया
सूरा संग हिंदी धीरे बड़ी हो गयी
भारत के इंदु भारतेंदु का आधार पाय
शैल सुता के समान हिंदी खड़ी हो गयी .
सूरज का ताप और चाँद की शीतलता
दोनों गुण एक हिंदी में ही पाईये
चिरजीवी चिरयुआ देववाणी महावाणी
ऐसी देवनागरी की लिपि अपनाईये.
हीन भावना मिटाओ खुद को बढाओ आगे
ज्ञान और विज्ञान के तर्क समझाइये
आदि गुरु आर्यभट हिंदु में बनाया बिंदु
बिंदु की महत्ता आज हिंदी में समझायिए
हिंदी से हिदुत्वा और हिन्दुस्तान की शान है
आन बान शान और मान को बढाइये.
पूर्णिमा बाजपेयी
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- मै पूर्णिमा बाजपेयी मेरा बस इतना सा परिचय है की, मै भावनाओं और संवेदनाओं में जीती हूँ. सामाजिक असमानता और विकृतियाँ मुझे हिला देती हैं. मै अपने देश के लोगों से बहुत प्रेम करती हूँ. और चाहती हूँ की मेरे देश में कोई भी भूखा न सोये.सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले ,और हर बेटी को उसके माँ बाप के आँगन में दुलार मिले.