सुनो बसंत
सुनो बसंत,
अबकी आए हो
तो थोड़ा ठहर जाना
बहुत कुछ कहना सुनना
खुलकर बतियाना
अबकी आए हो, तो
सर सर सर सर सर
सन सन सन सन
चलते ही मत रहना
थोड़ा गात को सहलाना
कपोलों को चूमना
दृगों के ठहराव को
हिरनी सी चंचलता देना
कुछ अनकहा सा
बंद है अधरों में
प्रस्फुटित कर देना
सुनो बसंत,
अबकी तुम,
मेरे मन में पलना
आंखों में झरना
अधरों से फूटना
रोम रोम को सिक्त कर
अपने आगोश में
लेकर उड़ना
चलना थिरकना
विश्रांति लेना
जहां विहंसते नव पल्लव
और खिलखिलाते तरुवर हो
जहां रसाल बौराए हो
जहां महुआ मदमाता हो
पलाश से रक्ताभ
रुखसार हों
जहां दुख को सुख में
बदलने की माया हो
भुला दे जो बैर भाव
ऐसे द्रुमों की छाया हो
जहां जीवन हो
आशा हो,
उम्मीद हो,
और परिंदों की तरह
नापने को सारा आकाश हो|
पूर्णिमा बाजपेयी
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