Friday, July 3, 2026

 विश्वास की डगर

उपमा की शादी को दस वर्ष हो चुके थे। विवाह के समय उसके मन में भी वही सपने थे जो हर लड़की देखती है-एक प्यार करने वाला पति, खुशहाल परिवार और आदर सम्मान से भरा जीवन। लेकिन उसके सपनों की दुनिया धीरे-धीरे बिखरने लगी।उसका पति अनुज बाहर से बहुत सभ्य और प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता था, पर घर की चारदीवारी के भीतर उसका दूसरा ही रूप था। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना,मदिरा पीकर अपमानजनक शब्द कहना और उपमा की हर बात में कमी निकालना बेइज्जती करना उसकी आदत बन चुकी थी। समय के साथ यह मानसिक उत्पीड़न और बढ़ता ही गया।उपमा कई बार सोचती कि शायद उससे ही कोई गलती हो रही है। वह हर संभव प्रयास करती कि घर में शांति बनी रहे, परंतु अनुज का व्यवहार नहीं बदलता।सास ससुर और बच्चों के सामने भी वह उपमा को नीचा दिखाने से नहीं चूकता था। धीरे-धीरे उपमा का आत्मविश्वास टूटने लगा।एक दिन उसकी बेटी मान्या ने उससे पूछा,"माँ, क्या हर पत्नी को ऐसे ही रहना पड़ता है?"यह प्रश्न उपमा के हृदय में तीर की तरह लगा। उसने महसूस किया कि उसकी चुप्पी केवल उसे ही नहीं, बल्कि उसके बच्चों को भी गलत संदेश दे रही है।उस रात उसने बहुत विचार किया। अगले दिन उसने अपनी एक सहेली की मदद से एक महिला सहायता समूह से संपर्क किया। पहली बार उसने अपने दर्द को शब्द दिए। उसे पता चला कि सम्मान और सुरक्षा हर व्यक्ति का मूल अधिकार है।धीरे-धीरे उपमा ने अपने लिए खड़े होना सीखा। उसने अपने कौशल को निखारा,उसने बी एड किया और एक विद्यालय में नौकरी शुरू की और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने लगी। जब अनुज ने देखा कि अब उपमा डरकर चुप रहने वाली नहीं है,तो उसका व्यवहार और उग्र हो गया पर उपमा ने भी सोंच लिया कि अपने बच्चों के भविष्य के लिए उसे हार नहीं माननी है।बच्चों और सास ससुर ने भी मदद की तो अनुज को अपने व्यवहार पर विचार करना पड़ा।समय लगा, संघर्ष भी हुआ, लेकिन उपमा ने अपनी खोई हुई पहचान वापस पा ली। उसने समझ लिया कि सहनशीलता एक गुण है, पर अन्याय सहते रहना नहीं।आज जब वह अपनी बेटी को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते देखती है, तो मुस्कुरा उठती है। उसने अपनी बेटी को सिखाया था कि रिश्तों की नींव प्रेम और सम्मान पर टिकी होती है, भय और अत्याचार पर नहीं।

पूर्णिमा बाजपेयी 

 जकड़न 

आज पतिदेव ने फिर मदिरा पान करके अभद्र शब्दों के तीर चलाने शुरू कर दिए। रोज की भांति मेरी कमियां गिनाना प्रारम्भ किया तुम्हें ये नहीं आता तुम्हें वो नहीं आता और फिर मेरी सबसे बड़ी अयोग्यता मेरा बच्चे को जन्म न दे पाना इस ताने के बिना तो कोई बात पूरी ही नहीं होती है।अपने इतने अपमान के बाद भी मुझे माँ और बाबूजी का चेहरा याद रहता और उनकी बात कानों में गूंजती बिटिया जो सह गया सो रह गया। और मैं जीवन की अगली भोर की प्रतीक्षा करने लगती। बाबू जी माँ की कितनी इज्जत करते थे मुक्त कंठ से सबके सामने परिवार में माँ के योगदान की सराहना करते। और मैं पूरी तरह से आर्थिक, पारिवारिक, और सामाजिक दायित्व वहन करने के बाद भी तारीफ के दो शब्दों के लिए तरस गई। हमेशा अपने में ही कमियां खोजती रही। पर आज अंदर कुछ हिल सा गया जब गृह सहायिका सुमन ने बताया कि "मैडम जी हमने तो अपने मरद को अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर उसने जरा भी बदतमीजी से बात की या फिर से हाथ उठाया तो मैं उसे छोड़कर अलग रहने लगूंगी।भला ये भी कोई बात हुई कि मैं हाड़तोड़ मेहनत करके घर चलाऊं और तुम बैठकर दारू पियो और हुकुम चलाओ और भी न जाने क्या क्या बोलती गयी उसके आधे अधूरे स्वर मेरे कानों में पड़ रहे थे पर मन कहीं और अपनी तलाश में जुटा था। सोंच रहा था कि ये कम पढ़ी लिखी स्त्री कितनी साहसी है और हम पढ़ी लिखी महिलाओं को कितनी बेड़ियों ने जकड़ रखा है जिन्हें काटने का साहस जुटाते जुटाते हमारी उम्र गुजर जाती है।

पूर्णिमा बाजपेयी 

Thursday, March 19, 2026

 सुनो बसंत 

 सुनो बसंत,
 अबकी आए हो
 तो थोड़ा ठहर जाना
 बहुत कुछ कहना सुनना
 खुलकर बतियाना 
 अबकी आए हो, तो 
 सर सर सर सर सर 
 सन सन सन सन
 चलते ही मत रहना
 थोड़ा गात को सहलाना 
 कपोलों को चूमना
 दृगों के ठहराव को 
 हिरनी सी चंचलता देना
 कुछ अनकहा सा 
 बंद है अधरों में 
 प्रस्फुटित कर देना 
 सुनो बसंत,
 अबकी तुम, 
 मेरे मन में पलना 
 आंखों में झरना 
 अधरों से फूटना
 रोम रोम को सिक्त कर
 अपने आगोश में
 लेकर उड़ना 
 चलना थिरकना 
 विश्रांति लेना
 जहां विहंसते नव पल्लव 
और खिलखिलाते तरुवर हो 
जहां रसाल बौराए हो 
जहां महुआ मदमाता हो
पलाश से रक्ताभ 
रुखसार हों 
जहां दुख को सुख में 
बदलने की माया हो
भुला दे जो बैर भाव
ऐसे द्रुमों की छाया हो 
जहां जीवन हो
आशा हो,
उम्मीद हो, 
और परिंदों की तरह
नापने को सारा आकाश हो|

पूर्णिमा बाजपेयी 
8707225101

Monday, March 9, 2026

 

महिला दिवस पर विशेष 

सुनो मैथिली अभी तुम्हारी 

अग्नि परीक्षा बाक़ी है,

इस समाज के अंतर्मन की 

पूर्ण समीक्षा बाक़ी है |

कितना अब भी सह सकती हो,

क्या अभी तितिक्षा बाक़ी है |

कैसे सब अच्छा ही लिख दूँ,

अच्छा दिखने और होने के 

बीच प्रतीक्षा बाक़ी है|


पूर्णिमा बाजपेयी 

8707225101

Friday, March 6, 2026

मत आना बापू

२ अक्टूबर पर बापू को श्रद्धांजलि
कल राजघाट पर
 प्रातः सैर करते करते
कुछ कदम चली,
अचानक एक दुबली पतली 
काया सामने आकर खड़ी हो गई .
मैंने जरा गौर से देखा 
अरे |ये तो बापू है  
मैं हुलास कर आगे बढ़ी
बोली बापू आप यहाँ कैसे ?
मैं गद-गद बापू मलिन,
उदासी और निराशा
 की प्रतिमूर्ति,
दींन  स्वर में बोले
बस अपने नौ निहालों से 
मिलने चला आया .
की थी परिकल्पना
जिस रामराज्य की
उसे देखने चला आया 
तदा ठहर कर, बापू बोले 
सोंचता हूँ कुछ दिन
यहीं ठहर जाऊं 
अपने देश और देशवासिओं में 
हिंसा के खिलाफ 
अहिंसा का मंत्र 
फिर फूंक जाऊं .
फिर रख जाऊं 
रामराज्य की आधार- शिला
फिर से करूँ उदघोष
हिंसा से हमें क्या मिला. 
मैंने कहा बापू 
आज कोई
 किसी की नहीं सुनता 
सिर्फ अपने और 
अपने लिए ही 
हर कोई है 
ताने -बाने बुनता .
मेरी माने तो बापू 
आप वहीँ रहिये 
यहाँ आयेगे तो पछतायेंगे 
सत्कर्तव्य सत्यनिष्ठा
संस्कार स्वभाषा के 
निधन पर आंसू बहाएगे.


पूर्णिमा बाजपेयी 







Wednesday, November 12, 2025

 उजास


"मैं हूं अपने बाबूजी की बिब्बो" दमदार खनकती पर सधी हुई आवाज इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय के सीनेट हाल में गूंज उठी। विवेचना धर शास्त्री डायस पर खड़े होकर स्नातक हुए विद्यार्थियों को संबोधित कर रही है। छरहरा इकहरा बदन, लंबा कद खादी सिल्क की धूमिल श्वेत रंग की साड़ी लंबे बालों का जूड़ा, उसमें करीने से लगा गुलाब का फूल और माथे पर दमकते सूरज के आकार की बिंदी। भारतीयता की चलती फिरती मिसाल कंठ में मां सरस्वती मानो साक्षात विराजती हों। अचानक एक पत्रकार का विनम्र स्वर में सवाल उसे अतीत के घेरे में ले गया। पत्रकार पूँछ रहा था मैडम आप अपना उद्बोधन इसी पंक्ति से क्यों आरंभ करती हैं यह सुनकर उसकी आंखों में अपने गाँव उडंगाखेड़ा से लेकर कैंब्रिज के सीनेट हॉल तक का सफर तिर गया जो उसकी आत्मा और शरीर दोनों को लहू - लुहान करने वाला रहा। नन्ही सी बिब्बो! तीन वर्ष की उम्र में इलाज के अभाव में माता चल बसी। पंडित गदाधर शास्त्री पुरोहिताई से अपना जीवन- यापन बड़ी शांति और संतोष के साथ कर रहे थे कि अचानक काल का यह वज्रपात उन्हें अंदर तक हिला गया। उनके सामने मासूम बिब्बो की परवरिश एक चुनौती के रूप में मुँह बाये खड़ी थी। खेड़े के बड़े बुजुर्गों ने दूसरे विवाह का हवाला दिया।कुछ ने तो त्रयोदशा: का भी इंतजार नहीं किया और फलाने की बिटिया फलाने की भतीजी का नाम सुझाने लगे। पर,शास्त्री जी को बिब्बो के अलावा अब कुछ भी नहीं सूझ रहा था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि अपनी फूल सी बेटी को विमाता का संत्रास नहीं देंगे।धीरे-धीरे समय बीता सहानुभूति दर्शाने वाले अपने-अपने कोटरो में सिमट गए, पिता पुत्री अकेले रह गए एक दूसरे का मौन समझने के लिए। जीवन नैया हिचकोले खाकर आगे बढ़ रही थी कि तभी खेड़ा में तूफान सा आ गया पंडित गदाधर शास्त्री ने फैसला लिया कि बिब्बो को खेड़ा से दूर शहर में भेज कर पढ़ाने का, गांव के बुजुर्गों की आपात बैठक हुई पंडित जी की बहुत लानत- मलानत हुई। मुखिया जी तल्ख़ लहज़े में बोले थे गांव का उसूल तोड़ रहे हो पंडित,अभी तक कोई बेटी गांव के स्कूल से आगे नहीं गई है। लेकिन अपनी मेधावी बिटिया की मेधा समझ चुके पिता ने किसी की नहीं सुनी। गांव वालों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया दबंगों ने उन्हें पूजा पाठ के लिए ना बुलाने का फरमान जारी कर दिया और बाकी सब दबंगों के डर से दूर हो चले। पंडित जी को अगल-बगल के गांव से जो भी मिलता उसी को संतोष से अपना भाग्य समझकर ग्रहण करते। समय बीता विवेचना धर शास्त्री ने इंटर की परीक्षा में जिले में टॉप किया था। दबंगों के मुह थोड़े सिकुड़ गए, वह आते जाते कानों में फ़बतियाँ कसते "करैं का तो चौका बासनय है वोखे ख़ातिर इतना पढ़य की का जरूरत है"। बाबूजी बिना किसी प्रतिक्रिया के आगे बढ़ जाते। बिब्बो ने बी.ए.,एम.ए., पी.एच.डी.और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन हर जगह अव्वल। जब जब वह प्रथम पंक्ति में खड़ी हुई उसका संकल्प दृढ़ होता गया, और उसके बाबूजी की आंखों का वात्सल्य गहराता गया। आज बाबूजी नहीं है पर, उनके द्वारा किया गया उजास उसकी आभा को देदीप्यमान कर रहा है और अनगिनत बिब्बो उस उजास की किरण से चमक रहीं हैं। सोचते सोचते उसकी आंखें अपने बाबूजी के लिए कृतज्ञता से छलक उठी।

Saturday, August 16, 2025

मां भारती मां सरस्वती 

 मां भारती मां सरस्वती 

हे शारदा हंस वाहिनी, 

दे ज्ञान चक्षु बनाओ ज्ञानी 

मन क्लेश हरो वरदायिनी।। 

वागेश्वरी मति गति सुधारो

चित्रांबरा वीणा को धारो,  

कंठ में बसे वेद चारों 

करके कृपा हमको उबारो।।

भुवनेश्वरी हे चंद्रकांति 

श्वेत कमला धवल वसना

हे विशालाक्षी जी धारो।।

मातु ममता का पिटारा

खोल आशीषों को वारो,

ब्रम्हजाया जगत जननी

भर ज्ञान की अंजुरी वारो।।

महाभागे कमल लोचनि

हर के जड़मति हमको तारो,

सुरपूजिता हे पद्मनिलया

मैं हूं अकिंचन अंश तेरा

कौमुदी,दृष्टि मेरी ओर डारो।।


पूर्णिमा बाजपेयी

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Kanpur, Uttar Pradesh, India
मै पूर्णिमा बाजपेयी मेरा बस इतना सा परिचय है की, मै भावनाओं और संवेदनाओं में जीती हूँ. सामाजिक असमानता और विकृतियाँ मुझे हिला देती हैं. मै अपने देश के लोगों से बहुत प्रेम करती हूँ. और चाहती हूँ की मेरे देश में कोई भी भूखा न सोये.सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले ,और हर बेटी को उसके माँ बाप के आँगन में दुलार मिले.