२ अक्टूबर पर बापू को श्रद्धांजलि
कल राजघाट पर
अरे |ये तो बापू है
मैं हुलास कर आगे बढ़ी
बोली बापू आप यहाँ कैसे ?
मैं गद-गद बापू मलिन,
उदासी और निराशा
की प्रतिमूर्ति,
दींन स्वर में बोले
बस अपने नौ निहालों से
मिलने चला आया .
की थी परिकल्पना
जिस रामराज्य की
उसे देखने चला आया
तदा ठहर कर, बापू बोले
सोंचता हूँ कुछ दिन
यहीं ठहर जाऊं
अपने देश और देशवासिओं में
हिंसा के खिलाफ
अहिंसा का मंत्र
फिर फूंक जाऊं .
फिर रख जाऊं
रामराज्य की आधार- शिला
फिर से करूँ उदघोष
हिंसा से हमें क्या मिला.
मैंने कहा बापू
आज कोई
किसी की नहीं सुनता
सिर्फ अपने और
अपने लिए ही
हर कोई है
ताने -बाने बुनता .
मेरी माने तो बापू
आप वहीँ रहिये
यहाँ आयेगे तो पछतायेंगे
सत्कर्तव्य सत्यनिष्ठा
संस्कार स्वभाषा के
निधन पर आंसू बहाएगे.
कल राजघाट पर
प्रातः सैर करते करते
कुछ कदम चली,
अचानक एक दुबली पतली काया सामने आकर खड़ी हो गई .
मैंने जरा गौर से देखा अरे |ये तो बापू है
मैं हुलास कर आगे बढ़ी
बोली बापू आप यहाँ कैसे ?
मैं गद-गद बापू मलिन,
उदासी और निराशा
की प्रतिमूर्ति,
दींन स्वर में बोले
बस अपने नौ निहालों से
मिलने चला आया .
की थी परिकल्पना
जिस रामराज्य की
उसे देखने चला आया
तदा ठहर कर, बापू बोले
सोंचता हूँ कुछ दिन
यहीं ठहर जाऊं
अपने देश और देशवासिओं में
हिंसा के खिलाफ
अहिंसा का मंत्र
फिर फूंक जाऊं .
फिर रख जाऊं
रामराज्य की आधार- शिला
फिर से करूँ उदघोष
हिंसा से हमें क्या मिला.
मैंने कहा बापू
आज कोई
किसी की नहीं सुनता
सिर्फ अपने और
अपने लिए ही
हर कोई है
ताने -बाने बुनता .
मेरी माने तो बापू
आप वहीँ रहिये
यहाँ आयेगे तो पछतायेंगे
सत्कर्तव्य सत्यनिष्ठा
संस्कार स्वभाषा के
निधन पर आंसू बहाएगे.
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