विश्वास की डगर
उपमा की शादी को दस वर्ष हो चुके थे। विवाह के समय उसके मन में भी वही सपने थे जो हर लड़की देखती है-एक प्यार करने वाला पति, खुशहाल परिवार और आदर सम्मान से भरा जीवन। लेकिन उसके सपनों की दुनिया धीरे-धीरे बिखरने लगी।उसका पति अनुज बाहर से बहुत सभ्य और प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता था, पर घर की चारदीवारी के भीतर उसका दूसरा ही रूप था। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना,मदिरा पीकर अपमानजनक शब्द कहना और उपमा की हर बात में कमी निकालना बेइज्जती करना उसकी आदत बन चुकी थी। समय के साथ यह मानसिक उत्पीड़न और बढ़ता ही गया।उपमा कई बार सोचती कि शायद उससे ही कोई गलती हो रही है। वह हर संभव प्रयास करती कि घर में शांति बनी रहे, परंतु अनुज का व्यवहार नहीं बदलता।सास ससुर और बच्चों के सामने भी वह उपमा को नीचा दिखाने से नहीं चूकता था। धीरे-धीरे उपमा का आत्मविश्वास टूटने लगा।एक दिन उसकी बेटी मान्या ने उससे पूछा,"माँ, क्या हर पत्नी को ऐसे ही रहना पड़ता है?"यह प्रश्न उपमा के हृदय में तीर की तरह लगा। उसने महसूस किया कि उसकी चुप्पी केवल उसे ही नहीं, बल्कि उसके बच्चों को भी गलत संदेश दे रही है।उस रात उसने बहुत विचार किया। अगले दिन उसने अपनी एक सहेली की मदद से एक महिला सहायता समूह से संपर्क किया। पहली बार उसने अपने दर्द को शब्द दिए। उसे पता चला कि सम्मान और सुरक्षा हर व्यक्ति का मूल अधिकार है।धीरे-धीरे उपमा ने अपने लिए खड़े होना सीखा। उसने अपने कौशल को निखारा,उसने बी एड किया और एक विद्यालय में नौकरी शुरू की और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने लगी। जब अनुज ने देखा कि अब उपमा डरकर चुप रहने वाली नहीं है,तो उसका व्यवहार और उग्र हो गया पर उपमा ने भी सोंच लिया कि अपने बच्चों के भविष्य के लिए उसे हार नहीं माननी है।बच्चों और सास ससुर ने भी मदद की तो अनुज को अपने व्यवहार पर विचार करना पड़ा।समय लगा, संघर्ष भी हुआ, लेकिन उपमा ने अपनी खोई हुई पहचान वापस पा ली। उसने समझ लिया कि सहनशीलता एक गुण है, पर अन्याय सहते रहना नहीं।आज जब वह अपनी बेटी को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते देखती है, तो मुस्कुरा उठती है। उसने अपनी बेटी को सिखाया था कि रिश्तों की नींव प्रेम और सम्मान पर टिकी होती है, भय और अत्याचार पर नहीं।
पूर्णिमा बाजपेयी
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