जकड़न
आज पतिदेव ने फिर मदिरा पान करके अभद्र शब्दों के तीर चलाने शुरू कर दिए। रोज की भांति मेरी कमियां गिनाना प्रारम्भ किया तुम्हें ये नहीं आता तुम्हें वो नहीं आता और फिर मेरी सबसे बड़ी अयोग्यता मेरा बच्चे को जन्म न दे पाना इस ताने के बिना तो कोई बात पूरी ही नहीं होती है।अपने इतने अपमान के बाद भी मुझे माँ और बाबूजी का चेहरा याद रहता और उनकी बात कानों में गूंजती बिटिया जो सह गया सो रह गया। और मैं जीवन की अगली भोर की प्रतीक्षा करने लगती। बाबू जी माँ की कितनी इज्जत करते थे मुक्त कंठ से सबके सामने परिवार में माँ के योगदान की सराहना करते। और मैं पूरी तरह से आर्थिक, पारिवारिक, और सामाजिक दायित्व वहन करने के बाद भी तारीफ के दो शब्दों के लिए तरस गई। हमेशा अपने में ही कमियां खोजती रही। पर आज अंदर कुछ हिल सा गया जब गृह सहायिका सुमन ने बताया कि "मैडम जी हमने तो अपने मरद को अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर उसने जरा भी बदतमीजी से बात की या फिर से हाथ उठाया तो मैं उसे छोड़कर अलग रहने लगूंगी।भला ये भी कोई बात हुई कि मैं हाड़तोड़ मेहनत करके घर चलाऊं और तुम बैठकर दारू पियो और हुकुम चलाओ और भी न जाने क्या क्या बोलती गयी उसके आधे अधूरे स्वर मेरे कानों में पड़ रहे थे पर मन कहीं और अपनी तलाश में जुटा था। सोंच रहा था कि ये कम पढ़ी लिखी स्त्री कितनी साहसी है और हम पढ़ी लिखी महिलाओं को कितनी बेड़ियों ने जकड़ रखा है जिन्हें काटने का साहस जुटाते जुटाते हमारी उम्र गुजर जाती है।
पूर्णिमा बाजपेयी
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