बजबजाती गलियाँ
भुतहे चेहरे
सभी कह रहे है
की मै बदनाम हो गयी हूँ.
मेरी कमजोर भावनाओं ,
आहत संवेगों ने
मुझे बदनामी की
दूकान बना दिया है.
चाहत के बाजार में
मैं प्रतिदिन बिकी हूँ .
उन भुतहे चेहरों की
सूखे होठों पर
लपलपाती जीभें
पूरे का पूरा खा
जाने वाली निगाहें
मुझमें ग्लानि नहीं जगाती
क्योंकि, मैंने
मन के बाजार में
चाहत की दूकान सजाकर
प्रेम की मुद्रा ले कर
देह की बेदी पर
एक लौ लगाई है .
मेरा तन और मन
मिलन स्थल है
उस क्षण का
जहां साड़ी कायनात से परे
एक शब्द गूजता है
प्रिय- प्रियतम- प्रेम
और तोड़ देता है बदनामी के
सारे मिथकों को.
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बहुत सुन्दर!
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