मुझे मालूम है कि
यह पहला अहसास है
जिसने मेरी आत्मा को छुआ
मैं बार- बार इस छुअन को
महसूस करना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है कि
यह क्षणिक आवेग है ,
मुझे मालूम है कि
यह मृग मरीचिका है,
फिर भी इसके पीछे भागती हूँ .
मुझे मालूम है कि
रेत से महल नहीं बनते
फिर भी बनाने का
प्रयास करती हूँ .
मुझे मालूम है कि इन
क्षणों में बार-बार मरी हूँ
फिर भी जीना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है कि
समर्पण ही प्रेम की परिभाषा है
फिर भी अपने आप को बांटती हूँ .
मुझे मालूम है की
यह स्वप्न है, छलावा है
फिर भी पलकों पर सजाती हूँ .
मुझे मालूम है की तुम
सूर्य हो मैं हूँ धरा
फिर भी तपिश पा
तपना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है की
तुम व्रक्ष हो मैं छांव हूँ
तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है की तुम
हारकर जीते ,
मैं जीत कर हारी
फिर भी तुम्हे
जीत देना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है की तुम
शब्द-शब्द बिखरे हो
तुम्हे समेट कर ,
एक रूप देना चाहती हूँ .
पूर्णिमा बाजपेयी
वो क्षण जब तुमने
मुझे छूकर,
कंचन बना दिया.
वो पल था अनमोल ,
जब तुमने अपने
प्रेम का प्रतिदान
मांग कर
मुझे दानी बना दिया .
वो क्षण जब तुम
किसी तरुण की भाति
याचक बन कर खड़े थे ,
और मैं किसी सोड्सी सम
अभिव्यक्ति से परे थी .
उस क्षण मैंने जी लिए
सहस्रों युग सहस्रों जन्म
और कैद कर लिया
उस अनुभूति को
जो अनुपम है ,अतुलनीय भी
जिसे महसूस कर
मरने से परे
मैं बार- बार
जी सकती हूँ .
पूर्णिमा बाजपेयी
उधार का दिए से
घर रोशन नहीं होता
वक़्त बदलते ही कोई आएगा
अक्स की हकीक़त समझाएगा
और दिए को ले जायेगा
मेरे घर फिर अँधेरा रह जायेगा .
तुम उधार के दिए हो
तभी समझ जाती
तो अंतस की पीड़ा
को प्रश्रय न देती
अब तो जान पे बन आई है ,
इधर कुआं उधर खाई है
थोडा टिमटिमा कर
रौशनी दिखा कर
चाहत जगा कर
छू लिया मेरे मन के
मासूम कोने को .
बिखेर दी है अपने
अस्तित्व की रौशनी
मेरे तन-मन की गंध में
और अब समेटने लगे हो
अपने तन-मन की रौशनी को.
मैं चाहत की मारी
आजीवन अँधेरे का
अभिशाप झेलती रहूंगी
और फिर कभी
प्रेम को परिभाषित
करने की जुर्रत
न कर सकूँ
इस लिए उधार के
दिए की पीड़ा पालती रहूंगी.
पूर्णिमा बाजपेयी
मैं नारी हूँ
पूर्णता का पर्याय
हे पुरुष मेरे
पास आकर तुम
पूर्णत्व को प्राप्त करो.
अपनी साड़ी जिज्ञासाएं
अनैतिक कुंठाएं
पूरी विसमतायें
मुझमे स्नान करके
मेरे ही अन्दर
छोड़ दो और
मैं उन्हें परिमार्जित
कर दूँगी एक
सुघड़ नया रूप
जो होगा एक
चेहरा सलोना
.उस नए प्रस्फुटन
को सामने रख
मैं तुम्हे उसमे
तुम्हारा ही रूप
दिखाउंगी तब तुम
मेरी क्षमता और
ममता को परख ,
मेरे आँचल में
सामाजाना.
और फिर एक बार
मै तुम्हे प्यार से
चूमकर सारी कुंठाओं
को दूर कर
तुम्हे पूर्ण पुरुष
बना पूर्णत्व दूँगी.
पूर्णिमा बाजपेयी
वो कामकाजी औरत
घर और समाज में
समानता का बोझ
अपने कंधे पर उठाये
स्कूलों ,दफ्तरों,
और समाज में अपनी
प्रतिभा बिखेरती है .
वो कामकाजी औरत
दिखती है गिट्टी तोड़ती
सड़कों से कचरा बीनती
दुधमुहें शिशु को परे रख
सर पर बोझ उठाती.
वो कामकाजी औरत
सहती है वासना
से भरी द्रष्टि
बचाती है समाज
के अस्तित्व को
फिर जानती है
एक पुरुष को
जो उघारता है
तन और मन
देता है नासूर
जो सालता है
उम्र दराज होने तक .
पूर्णिमा बाजपेयी
तुम्हारे सृजन का पथ
अगर मेरी आत्मा के
द्वार से गुजरता है
तो यह अजर- अमर
तुम्हारे सृजन को
सतत प्रवाहित सरिता बना
अपने में मिला लेगी .
तुम्हारे सृजन का पथ
मेरे ह्रदय के द्वार से
गुजरता है तो शब्दों को
प्रीति में डुबो माधुर्य
की लेखनी से सवार
आकंठ डूबी भावनाओं
का उपहार देगी.
तुम्हारे सृजन का पथ
मेरे गात से गुजरता है
तो इस शरीर को
तपोभूमि बना देह की
आग से तपा पूर्णता से
भर तुम्हारे सृजन को
अपरिमित होने का
अहसास देगी .
पूर्णिमा बाजपेयी
अपनी कोमल भावनाओं
निश्चल व्यवहार
दुनियावी पाखण्ड से दूर
तुम फिर छली गयी
क्यों तुमने अपनी आँखों पर
भावनावों का चश्मा
चढ़ा रखा है.
क्यों तुम बार-बार
लुटती हो, टूटती हो,बिखरती हो.
कभी न सिमटने के लिए
खुद को मानो ,जानो,पहचानो
भेड़ियों की भीड़ में
बकरी बन मिमियाने
से मिट जाओगी
सिंहनी बन दहाड़ो.
पूर्णिमा बाजपेयी