यह पहला अहसास है
जिसने मेरी आत्मा को छुआ
मैं बार- बार इस छुअन को
महसूस करना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है कि
यह क्षणिक आवेग है ,
मुझे मालूम है कि
यह मृग मरीचिका है,
फिर भी इसके पीछे भागती हूँ .
मुझे मालूम है कि
रेत से महल नहीं बनते
फिर भी बनाने का
प्रयास करती हूँ .
मुझे मालूम है कि इन
क्षणों में बार-बार मरी हूँ
फिर भी जीना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है कि
समर्पण ही प्रेम की परिभाषा है
फिर भी अपने आप को बांटती हूँ .
मुझे मालूम है की
यह स्वप्न है, छलावा है
फिर भी पलकों पर सजाती हूँ .
मुझे मालूम है की तुम
सूर्य हो मैं हूँ धरा
फिर भी तपिश पा
तपना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है की
तुम व्रक्ष हो मैं छांव हूँ
तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है की तुम
हारकर जीते ,
मैं जीत कर हारी
फिर भी तुम्हे
जीत देना चाहती हूँ .
मुझे मालूम है की तुम
शब्द-शब्द बिखरे हो
तुम्हे समेट कर ,
एक रूप देना चाहती हूँ .
पूर्णिमा बाजपेयी
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