Thursday, August 7, 2025

 

हरे कांच की चूड़ियां

आज फिर उसने अपने वार्डरोब से सुंदर,चटकीले हरे रंग की साड़ी निकाली और बहुत ही सुघड़ता से तैयार होकर ड्रेसिंगटेबल के आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर खुद को निहारा।अचानक उसकी नज़र अपने सूने हाँथों पर गयी उसने झट से बैंगलबाक्स से सम्हाल कर रखी गयी पुरानी कामदार हरी चूड़ियां निकाल कर पहन लीं। अतीत के तमाम चलचित्र उसकी सजल आंखों में तैर गये। ये उसकी मां की दी हुयी अनुपम और अंतिम सावनी थी जिसे वो साल दर साल जीती है।क्योंकि अब मां-मायका और मन इन्हीं हरी कामदार चूड़ियों में समा गया है।

पूर्णिमा बाजपेयी

109/191ए जवाहर नगर कानपुर

8707225101

Tuesday, June 24, 2025

 ऊधौ का निर्गुण समेटे 

प्रेम के सब रस लपेटे

बांसुरी की तान पर, 

कृष्ण के आह्वान पर 

ब्रज नीलकंठी हो गया॥


पूर्णिमा बाजपेयी 

8707225101

 कंधे जिनके सिंहों से

चौड़ी है जिनकी छाती,

वतन सुरक्षा के हित

आती है जब पाती॥

सारा ममत्व लेकर

मां धैर्य को जगाती,

उन्नत ललाट पर तिलक

विजयश्री का लगाती॥

उम्मीदें और आशाएं

प्यार से समझाती,

देती विदायी हंसकर

आशीष भी लुटाती॥

वीर सिपाही की मां

अपने अश्रु छिपाती,

वीर प्रसूता जननी 

शौर्य त्याग समझाती॥

जिनकी ललकारों के आगे

हैं, शत्रुगण घबराते,

मां की धानी चूनर में

तारों की किरन लगाते॥

एक एक तृण का ऋण

लौटाने को उमगाते,

भारत के बेटे हैं ये 

भारत का मान बढ़ाते॥


पूर्णिमा बाजपेयी

8707225101



 सदियों की आराधना 

और साधना पूरी हुयी

आ रहे रघुकुल शिरोमणि

आ रहे.......

सुभग,सुंदर,सुखद शीतल 

गीत मंगल गा रहे

आ रहे.......

सज गये हैं द्वार चौखट

कुंज गलियारे सजे

सज गयीं अट्टालिकाएं

घर के चौबारे सजे

भावना कर्तव्य निष्ठा

के समर्पण आ रहे

आ रहे........


पूर्णिमा बाजपेयी

8707225101

 गुरू ज्ञान है


गुरू ज्ञान है

गुरू ज्ञान है, गुरू मान है

गुरू शब्द ही महान है,

गुरू आत्मा परमात्मा

गुरू मनुज का अभिमान है॥

गुरू ज्ञान है

गुरू गीत है गुरू मीत है

गुरू नीति है गुरू रीति है,

गुरू सम्पदा है ज्ञान की 

गुरू सद्गुणों की प्रीत है॥


पूर्णिमा बाजपेयी 

8707225101

Wednesday, April 9, 2025

 वाणी वंदना

मैं अज्ञानी ज्ञान भरो मां

मैं अबोध मेरी बांंह धरो मां

कंठ कोकिला अर्जन सर्जन,

की देवी तुम संग विहरो॥

त्रिभुवन पोषणि ज्ञान की देवी

मेरे सुर के संग विहरो,

शब्दों के मैं चित्र उकेरूं

उन चित्रों में रंग भरो॥


पूर्णिमा बाजपेयी

8707225101

मुक्तक

  1

मैं शब्द-शब्द हारी, मैं शब्द-शब्द जीती।

जीवन की वादियों में, आकंठ मैं हूं रीती।

गर पास आओ मेरे सुन पाओ तो सुनो तुम,

कैसे सुनाऊं तुमको तन्हा मैं आपबीती॥

2

राम को जागीर अपनी मत कहो, राम तो सब में समाए हैं।

जर्रा जर्रा जम्बूदीपे भरतखंडे, राम तो हम सबके साये हैं।

राम के शुभ कर्म और रामत्व में रम धरा मर्यादित हुयी,

राम आदि अनंत हैं राम धुन हर सांस में सब में जगाये हैं॥

3

जब जब प्रेम को ठोकर लगती,तब तब आंसू आते हैं।

 आपऔर करीब आ जाते हैं,जब जब आंसू आते हैं।

अंतस की पावक में जलकर,हृदय अनल झुलसाती है,

सुरभि समीर न कुछ कर पाये,  बेकल मन कर जाते हैं॥


पूर्णिमा बाजपेयी

8707225101



 

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Kanpur, Uttar Pradesh, India
मै पूर्णिमा बाजपेयी मेरा बस इतना सा परिचय है की, मै भावनाओं और संवेदनाओं में जीती हूँ. सामाजिक असमानता और विकृतियाँ मुझे हिला देती हैं. मै अपने देश के लोगों से बहुत प्रेम करती हूँ. और चाहती हूँ की मेरे देश में कोई भी भूखा न सोये.सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले ,और हर बेटी को उसके माँ बाप के आँगन में दुलार मिले.