Saturday, August 29, 2026

 

अम्मा, तुम बिन आँगन सूना लगता है

घर की चौखट और दीवारें वैसी ही हैं,

आँगन में तुलसी की क्यारी वैसी ही है।

 बस तेरे आँचल की छाँव नहीं है

जो दुलराए तेरे जैसा वैसी ठांव नहीं है

तेरे बिन हर कोना सूना लगता है।

अम्मा, तुम बिन आँगन सूना लगता है

पूर्णिमा बाजपेयी त्रिपाठी 

मो. 8707225101

 ओ! काले काले बादल 

मेरा भी तुम ख़त ले जाते 

ओ काले काले बादल 

और उधर से भी संदेशा

ले आते काले बादल||

 मैंने लिखा है पाती में 

भोर सुनहरी लंबी रातें,

कब से चौखट पर बैठी मैं 

सोच रही हूं बीती बातें|| 

तुम बिन पावस ऐसा लगता

 जैसे मेघा आग उगलता, 

छन छन छन करती बूंदों से

 मुझको कोई सुख ना मिलता|| 

कहना उनसे याद तुम्हारी

हर पल मुझको बहुत सताती,

पावस की हर भीगी आहट

तेरी आहट बनकर आती||

जब-जब चपला नभ में दमके ,

मन में टीस नई दे जाती।

पलकों पर बैठी आशाये 

नयन नीर बनकर बह जाती||

बैठ रसालों की डाली पर 

कोयल विरहा गीत सुनाती।

पीव पीव पपीहे की धुन सुन

मन की पीड़ा है बढ़ जाती||

भीगे खेत, नदी, वन, उपवन,

महकी महकी सभी दिशाएँ।

सूना-सूना मन का आँगन,

तेरे बिन सब अगन लगायें||

कहना प्रिय से एक झलक को

व्याकुल नयना राह निहारें।

तुम बिन सब कुछ लगे अधूरा 

कैसे बीतें ये दिन सारे||

मेरा भी तुम ख़त ले जाते 

ओ’ काले काले बादल, 

और उधर से भी संदेशा

ले आते काले बादल||


पूर्णिमा बाजपेयी त्रिपाठी

मो. 8707225101

ज़िंदगी उलझनों का पिटारा रही

 ज़िंदगी उलझनों का पिटारा रही,

कभी बेचैन, कभी एक सितारा रही।

ग़मज़दा हूँ, मगर अब भी ज़िंदा हूँ मैं,

तीरगी में भी जीने का सहारा रही।

दर्द की धूप में भी मुस्कुराती रही ,

जिंदगी हर मोड़ पर आज़माती रही ।

ठोकरों ने सँवारा है हर एक कदम,

हौसलों की शमा मैं जलाती रही ।

अश्क आँखों में थे, होंठ हँसते रहे,

दर्द दिल के सभी चुप ही सहते रहे।

रात जितनी भी गहरी हुई राह में,

सहर के ख़्वाब फिर भी महकते रहे।

हार मानूँ, ये आदत कभी थी नहीं,

दोस्ती दर्द से भी नई थी नहीं।

आज़माइश किया ज़िंदगी ने मुझे,

उससे लड़ना इबादत मेरी बन गई।

है यक़ीं अब भी, बदलेगा ये सिलसिला,

हर अँधेरे के आगे है इक रौशनी ।

ज़िंदगी चाहे जितनी कठिन हो मगर,

मेरी हिम्मत ने कभी साथ छोड़ा नहीं।


पूर्णिमा बाजपेयी त्रिपाठी 

मो. 8707225101

 सावन

सावन मेघा, छम छम बरसें 

देखो अंबर नाच रहा है,

धरती को दे चूनर धानी 

नेह की पाती बांच रहा है।।

हरी ओढ़नी ओढ़ धरा ने 

अपना सुंदर रूप सवारा, 

इठलाती नदियों के तट पर 

पीव पीव पपीहे ने पुकारा।।

पूर्णिमा बाजपेयी त्रिपाठी 

मो. 8707225101

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Kanpur, Uttar Pradesh, India
मै पूर्णिमा बाजपेयी मेरा बस इतना सा परिचय है की, मै भावनाओं और संवेदनाओं में जीती हूँ. सामाजिक असमानता और विकृतियाँ मुझे हिला देती हैं. मै अपने देश के लोगों से बहुत प्रेम करती हूँ. और चाहती हूँ की मेरे देश में कोई भी भूखा न सोये.सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले ,और हर बेटी को उसके माँ बाप के आँगन में दुलार मिले.