ज़िंदगी उलझनों का पिटारा रही
ज़िंदगी उलझनों का पिटारा रही,
कभी बेचैन, कभी एक सितारा रही।
ग़मज़दा हूँ, मगर अब भी ज़िंदा हूँ मैं,
तीरगी में भी जीने का सहारा रही।
दर्द की धूप में भी मुस्कुराती रही ,
जिंदगी हर मोड़ पर आज़माती रही ।
ठोकरों ने सँवारा है हर एक कदम,
हौसलों की शमा मैं जलाती रही ।
अश्क आँखों में थे, होंठ हँसते रहे,
दर्द दिल के सभी चुप ही सहते रहे।
रात जितनी भी गहरी हुई राह में,
सहर के ख़्वाब फिर भी महकते रहे।
हार मानूँ, ये आदत कभी थी नहीं,
दोस्ती दर्द से भी नई थी नहीं।
आज़माइश किया ज़िंदगी ने मुझे,
उससे लड़ना इबादत मेरी बन गई।
है यक़ीं अब भी, बदलेगा ये सिलसिला,
हर अँधेरे के आगे है इक रौशनी ।
ज़िंदगी चाहे जितनी कठिन हो मगर,
मेरी हिम्मत ने कभी साथ छोड़ा नहीं।
पूर्णिमा बाजपेयी त्रिपाठी
मो. 8707225101
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