ओ! काले काले बादल
मेरा भी तुम ख़त ले जाते
ओ काले काले बादल
और उधर से भी संदेशा
ले आते काले बादल||
मैंने लिखा है पाती में
भोर सुनहरी लंबी रातें,
कब से चौखट पर बैठी मैं
सोच रही हूं बीती बातें||
तुम बिन पावस ऐसा लगता
जैसे मेघा आग उगलता,
छन छन छन करती बूंदों से
मुझको कोई सुख ना मिलता||
कहना उनसे याद तुम्हारी
हर पल मुझको बहुत सताती,
पावस की हर भीगी आहट
तेरी आहट बनकर आती||
जब-जब चपला नभ में दमके ,
मन में टीस नई दे जाती।
पलकों पर बैठी आशाये
नयन नीर बनकर बह जाती||
बैठ रसालों की डाली पर
कोयल विरहा गीत सुनाती।
पीव पीव पपीहे की धुन सुन
मन की पीड़ा है बढ़ जाती||
भीगे खेत, नदी, वन, उपवन,
महकी महकी सभी दिशाएँ।
सूना-सूना मन का आँगन,
तेरे बिन सब अगन लगायें||
कहना प्रिय से एक झलक को
व्याकुल नयना राह निहारें।
तुम बिन सब कुछ लगे अधूरा
कैसे बीतें ये दिन सारे||
मेरा भी तुम ख़त ले जाते
ओ’ काले काले बादल,
और उधर से भी संदेशा
ले आते काले बादल||
पूर्णिमा बाजपेयी त्रिपाठी
मो. 8707225101
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