Tuesday, March 2, 2010

रत है जो औरों के लिए
उस औरत का दर्द भी
साँझा होता है .
बाप की देहलीज पर
माँ के आंसुओं की
सांझी पीड़ा ,
जवान बहनों के
बुढ़ाते अरमानो
की कसक
बेरोजगार भाई की
आँखों में व्यवस्था
के खिलाफ
आक्रोश
सबके आसुओं
के साथ
अपने भी आंसू
मिला ,साथ- साथ
पीती है .करती है
संघर्ष अपने
अस्तित्व की पहचान को
शाख से टूटकर
जोडती है
तिनका तिनका
बनाती है नीड़
बाँटती है दुःख
और दर्द सांझे
इस घर के
उस घर के.

पूर्णिमा बाजपेयी 

Sunday, February 21, 2010

पावन होली के पर्व पर आप सभी को शुभ कामनाएं होली का यह पर्व रंगों का पर्व है जीवन के विविध रंग इसमें समाहित हैं . यह रंग हमें जीने की प्रेरणा देते है अतः आइये  हम सभी मिलकर पूरे विश्व में खुशियों के रंग बिखेरनें  का सार्थक प्रयास करें ताकि पूरे विश्व में बुराइयों की पराजय हो और प्रेम भाईचारा तथा सौहार्द बढे .आज  विश्व  बुरी तरह आतंकवाद की चपेट में है अतः होली का यह पर्व हिंसा की पराजय और अहिंसा की सदैव विजय की ओर इंगित करता है.वर्तमान समय में त्योहारों के भी मायने बदलते जा रहे है हर जगह औपचारिकता ही नजर आ रही है मेल मिलाप के अर्थ ही बदल गए है गिव एंड टेक का जमाना है.पहले हर कोई सद्भावना व प्रेमवश एक दूसरे के घर आता जाता था   पर अब  सुविधा तथा फायदे के आधार पर जाने की कोशिश करते है .

Monday, February 15, 2010

२०२० में सम्पूर्ण विश्व आतंकवाद की गिरफ्त से बाहर आ जाये पर्यावरण संबधित जितनी भी समस्याएं है उनके प्रति आम आदमी की जागरूकता बढे और ग्लोबल वार्मिंग से विश्व को बचाने हेतु कड़े कदम उठाये जाएँ .देश दुनियां की सीमाओं से परे हम सिर्फ मानवता को ही अपना प्रमुख धर्म समझें .

Sunday, February 14, 2010

१३ फरवरी २०१० को जर्मन बेकरी में हुए आतंकवादी हमले की जितनी भी निंदा की जाये वह कम है. एक बार फिर से वो अपनी नापाक चाल में कामयाब हो गए ,पर हमारे हौसले को कभी परास्त नहीं कर सकते .हम अपनी हिम्मत से उन्हें अपनी जड़े नहीं जमाने देंगें. जो लोग इस बम धमाके की चपेट में आयें हैं ईश्वर   उन्हें यह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करे दुःख की इस घड़ी में पूरा देश उनके साथ है .

Friday, January 22, 2010

इक्कीसवी सदी और नारी

इक्कीसवी सदी और नारी की स्थिति पर प्रायः  सभी जगह यही चर्चा होती है की आज नारी पूर्ण स्वतंत्र है पर सही मायने में देखा जाय तो नारी की ज्यादातर स्थिति वैसी  की वैसी ही है जैसी की मध्य काल से चली आ रही है कुछ एक  अपवादों को छोड़कर शेष तो आज भी वंचनाओं और यातनाओं की शिकार है ,और तब तक रहेंगी जब तक सामाजिक परिवेश पूरी तरह नहीं बदलेगा .आज भी औरत चाहें वो कामकाजी हो या घरेलू नित्यप्रति असमानता व दुर्व्यवहार की शिकार होती है .चिंतनीय यह है की औरते ही औरतो पर घात प्रतिघात का कोई  अवसर  नहीं चूकतीं और  आग  में  घी  डालने का कार्य  करती है.आज भी महिलाओं की स्थिति बड़ी ही सोचनीय है वे प्रायः घरेलू हिंसा की शिकार होती है अपमान सहती है फिर भी परिवार और समाज के प्रति अपना फर्ज निभाती हैं .

Thursday, January 21, 2010

ओल्ड एज होम

हमें ओल्ड एज होम की कतई भी आवश्यकता नहीं है यदि ये बढ़ रहे है तो यह हमारे मानव समाज के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है .जो माता पिता हमें ऊँगली पकर कर चलना सिखाते है उनके बुढ़ापे में हम उन्हें सम्मान के साथ रख नहीं सकते धिक्कार है हमें . आज बढ़ते हुए ओल्ड एज होम कहानी कह रहें है हमारी मरती हुयी संवेदनाओं की कितना सुरक्षित महसूस करते थे हम दादा जी की सीख से दादी जी के लाड से चाचा -चाची ताऊ -ताई मौसा -मौसी की देख भाल से माता-पिता के प्यार से पर संकुचित होती भावनाओं और मरती संवेदनाओं के दौर में सब कुछ कहीं खो सा गया है .ओल्ड एज होम की आवश्यकता केवल उन्हें है जो बेसहारा है जिनका कोई परिवार नहीं है उनके लिए सरकार और समाज को कुछ ऐसे स्थान बनाने चाहिए जिनमे वे शरण ले सकें .हमें  वृद्धो की सुरक्षा व देखभाल का पुख्ता इंतजाम करना होगा.

Tuesday, January 19, 2010

कड़ाके की ठण्ड

पूरे उत्तरी भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है ऊपरी तबके के लोग तथा कुछ हद तक मध्य वर्ग के लोग इसे आसानी से झेल लेते है पर वे क्या करे जिनका ओढ़ना आसमान और बिछौना जमीन है न तो प्रकृति को उन पर दया आती है और न ही हमारे कथित सभ्य समाज को. इस समय आवश्यकता है की हम सभी अपनी सोई हुई संवेदना को जगाये और जिससे जो बन पड़े उनके लिए करने का प्रयास करे .कुछ कम्बल और कुछ अलाव कइयो को जीवन दान दे सकते है .हम जो भी है जहाँ भी है जितना कुछ कर सकते है करें , आइये हम सभी मिलकर अपने ही भाई बहनों को बचाने की जद्दोजहद करे.

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Kanpur, Uttar Pradesh, India
मै पूर्णिमा बाजपेयी मेरा बस इतना सा परिचय है की, मै भावनाओं और संवेदनाओं में जीती हूँ. सामाजिक असमानता और विकृतियाँ मुझे हिला देती हैं. मै अपने देश के लोगों से बहुत प्रेम करती हूँ. और चाहती हूँ की मेरे देश में कोई भी भूखा न सोये.सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले ,और हर बेटी को उसके माँ बाप के आँगन में दुलार मिले.