सब ठूंठ ही ठूंठ
ज्यों -ज्यों हमने
'कलि' युग को
स्वर्ण युग में बदला
त्यों -त्यों कलपुर्जों
में बदल फिट होते गए
मशीनों में
बनते गए ठूंठ .
हमारी संवेदनाएं, भावनाएं,
वेदनाएं ,सर्जनाएं
सब ठूंठ ही ठूंठ
धरती से अम्बर तक
ठूंठ ही ठूंठ
काश! इन ठूंठों पर
एक कोमल ,चिकना
हरा -लाल पत्ता
मुलक कर
विहँस कर
स्वयं को जगा ले
और भर दे हरीतिमा से
इन ठूंठों को
और दे- दे
एक नया जीवन
एक नयी सोंच
एक नया परिवेश ,
और ठूंठ बदल जाये
हरे-भरे लक - दक
करते वृक्षों में
सब को दे साँस
जीने की आस .
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हर शब्द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति ।
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