होली गीत
अबके होली मैं पिया की हो, ली
टेसू गुलाल लगावत रसिया,
अंग लग्यो अंतर मन बसिया,
भीग गयो मेरा दामन चोली।
अबके होली मैं पिया की हो, ली।।
बचपन की सखियां और हमजोली
सब संग खेली होली अलबेली,
अबके होली मैं पिया की हो, ली।।
लाल, गुलाबी,नीला,पीला
अमलतास जैसा चटकीला,
दहके पलाश, ज्यों दहके तन मन
कोरा आंचल कर दिया गीला।।
प्रिय से रंगों की बात करूंगी
कुछ रंगों से ख़्वाब बुनूगी,
अनजाने रिश्तों में रंगकर
उन रिश्तों में रंग भरूंगी।।
जीवन की बगिया में चटकें
सुर्ख गुलाबों की जब कलियां,
मैं रंग दूंगी प्रेम गली की
साजन के मन की सब गलियां।।
हिरणी जैसे चपल दृग में
काजल का काला रंग सोहे,
मस्तक सुर्ख सिंदूरी सूरज
आनन की आभा मन मोहे।।
मैं खेलूं प्रीतम संग होली
अबके होली मैं पिया की हो, ली।।
कर पकड़े और बांह मरोड़ी
लाज का रंग मैं छिपा न पाई
ऐसा हो गया मुखड़ा मेरा
जैसे दूध में केसर घोली
अबके होली मैं पिया की हो, ली।।
पूर्णिमा त्रिपाठी बाजपेई
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