Monday, January 3, 2022

कामकाजी औरत

वो कामकाजी औरत है घर और समाज में समानता का बोझ अपने कंधे पर उठाये स्कूल ,दफ्तर, और समाज  में अपनी  प्रतिभा बिखेरती है. कुछ गलत होता देख बोलने को मुंह खोलती है उसके कानों में शब्द पड़ते हैं जादा ज्ञान पाड़े न बनो पता है बहुत पढ़ी लिखी हो लेकिन अपनी औकात मे रहो. वो सोंचने लगती है मां ने कहा था, शिक्षिका ने भी कहा था पढ़ने लिखने से नौकरी करने से औकात बदल जाती है. बदली क्या?   

पूर्णिमा बाजपेयी त्रिपाठी

109/191 A, जवाहर नगर कानपुर

मो. 8707225101

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मै पूर्णिमा त्रिपाठी मेरा बस इतना सा परिचय है की, मै भावनाओं और संवेदनाओं में जीती हूँ. सामाजिक असमानता और विकृतियाँ मुझे हिला देती हैं. मै अपने देश के लोगों से बहुत प्रेम करती हूँ. और चाहती हूँ की मेरे देश में कोई भी भूखा न सोये.सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले ,और हर बेटी को उसके माँ बाप के आँगन में दुलार मिले.