बेटियां तो प्यार हैं
सृष्टि का अंग आधा
पार करें द्वंद बाधा,
पृकति ने रचा जिसे
बांध प्रेम सार है।
इसिलिये तो बेटियां
सृष्टा और सृष्टि का
प्यारा दुलार हैं॥
सूने घर आंगन में
नूपुर की रुनझुन में,
ठुमक ठुमक पग धरें
घर को घर बना रहीं।
इसीलिये तो बेटियां
सृष्टा और सृष्टि का
सुंदर श्रंगार हैं॥
मां की नखरों नाज़ हैं
पिता के सर का ताज हैं,
वीरन की कलाई में
बंधा अभिमान हैं।
इसीलिये तो बेटियां
सृष्टा और सृष्टि का
अनुपम उपहार हैं॥
सरल सुघड़ चातक सी
देख रहीं आनन को,
खिलखिलाते तरुवर ज्यों
शोभित हों कानन को।
नेह वृष्टि करके सृष्टि
सपने सजा रहीं,
इसीलिये तो बेटियां
सृष्टा और सृष्टि की
रचना का आधार हैं॥
नव पल्लव खिल रहे
कुसुमित हो झूम के,
आदि और अनंत दोनों
संग संग रंग भरें
झुर्मुट में प्यार के।
इसीलिये तो बेटियां
सृष्टा और सृष्टि का
पूरा संसार हैं॥
पूर्णिमा त्रिपाठी बाजपेयी
109/191 ए’
जवाहर नगर कानपुर
8707225101