Saturday, June 18, 2016

धरती की आवाज सुनो

धरती की आवाज सुनो
कहे धरा मत छीनो मुझसे
मेरा हार सिंगार सुनो
धरती की आवाज सुनो,
काट – काट कर मेरे तन को
मन को घायल कर डाला
अब तो रहम करो आंचल पर
मेरी करुण पुकार सुनो
धरती की आवाज सुनो,
मेरा मस्तक मेरे बाजू
मेरी कटि जंघा मेरी
अंग – अंग मेरा तेरे हित
हित साधन को कुचल डाला
धरती की आवाज सुनो,
अति उपभोग करोगे तो तुम
क्या सौपोगे नस्लो को
रीता मेरा दामन होगा
आओ जरा विचार करो
धरती की आवाज सुनो,
मेरी हरी – भरी काया को
मत बदरंग बनाओ तुम
बाग – बगीचे पेड लगाओ
धरती मॉ को बचाओ तुम
धरती की आवाज सुनो,
मेरे  आंचल की छाया मे
मिलेगा प्यार – दुलार तुम्हे
युगो – युगो से कह्ती आयी हू
जीवन  का    सार  सुनो
धरती की आवाज सुनो.
पूर्णिमा त्रिपाठी (बाजपेयी)
109/164
जवाहर नगर कानपुर – 208012

Sunday, December 28, 2014

हिंदी हमारी शान

हिंदी से हिंदुत्व और हिन्दुस्तां  की आन है 
आन- बान- शान और  मान  को बढ़ाइए ,
देश हो विदेश दूर देश में भी बैठकर 
मातु मातृभाषा मातृभूमि गुण गाईये। 
सरल सुग्राह संतोष और सुख दे 
बतरस रस  घोले हृदय में उताररिये ,
हिंदी भाषा जन  भाषा आम भाषा रूप है
 ऐसी हिंदी भाषा पे सौ जन्मों को वारिये। 
कबीरा ने बीज डाला तुलसी ने पानी दिया 
सूरा संग हिंदी धीरे - धीरे बड़ी हो गयी ,
भारत के इंदु भारतेंदु का आधार पाय 
शैल सुता के समान  हिंदी खड़ी  हो गयी। 
सूरज का ताप  और चाँद की शीतलता 
दोनों गुण  एक हिंदी   में ही  पाइए,   
चिर जीवी चिर युवा  देववाणी महावाणी 
ऐसी देवनागरी की लिपि अपनाईये।
 हीन  भावना मिटाओ खुद को बढ़ाओ आगे 
ज्ञान और विज्ञान  के तर्क समझाइये, 
आदि गुरु आर्यभट्ट हिंदु  में बने थे 
बिंदु की  महत्ता आज हिंदी में  समझाइये। 



पूर्णिमा त्रिपाठी बाजपेई 

Sunday, October 6, 2013

जरूरत है जरूरत है तुम्हारी इस देश को

जरूरत है जरूरत है तुम्हारी इस देश को ,
जरूरत है तुम्हारे संकल्पों की,
तुम्हारे आदर्शो की ,
जरूरत है तुम्हारे अन्दर अनुशाशन की,
और इस देश को स्वक्ष  प्रशाशन की.
जरूरत है तुम्हारी निष्ठा की ,
तुम्हारे ज्ञान और विज्ञानं की।
जरूरत है माँ मात्रभूमि मात्रभाषा ,
पर अभिमान की।
जरूरत है तुम्हारे मुखमंडल
पर मंद स्मित हास  की,
जरूरत है तुम्हारी भावनाओं ,
संवेदनाओं में सुवास की। 
जरूरत है तुम्हारे संघर्ष ,
क्षमता और अविश्राम की। 
जरूरत है तुम्हारी गति में 
न लगने वाले विराम की।
इसलिए हे देश के कर्णधारों, 
अपनी क्षमता को पह्चानों, 
अपने विस्वाश को मानो ,
और पहुचा दो तिरंगे को 
अनन्त आकाश में।


पूर्णिमा त्रिपाठी    

Sunday, September 25, 2011

आतंकवाद से

यह जहर न जाने कितनी
बलियां और लेगा?
जाने कितनी माँ बहनों के
हृदय तडपायेगा.
कब तक होता रहेगा 
मानवता का नरसंहार ?
कब तक खंडित रहेगा 
मेरे स्वदेश का यह दुलार  
क्या कभी नहीं हो पायेगा
भाई का भाई से प्यार ?
क्या टुकडो  में बट जायेगी 
कश्मीरी सुषमा की बहार ?
क्यों प्यार बाटते हो सबका 
क्या तनिक भी तुमको क्षोभ नहीं ?
राम रहीम की वाणी क्या थी 
उसका कोई सोच  नहीं .
बंद करो यह भूल भुलैया 
झटको इन तुच्छ विचारों को 
यह सारा भारत अपना है 
मत सोचो देश बाटने को .
आतंकवाद की यह ज्वाला 
जैसे ही बुझ जायेगी 
भाईचारे से हर्षित हो 
यह वसुधा दीप जलायेगी .



पूर्णिमा त्रिपाठी

 

Thursday, February 17, 2011

प्रेम : एक अहसास

तू मेरी आँखों से देखे  
मैं तेरी  आँखों से देखूं
बड़ा ही प्यारा मंजर है 
जी चाहे दूर तलक देखूं .
सुहाने दिन, सुहानी रात
और सपने सलोने  हैं
वो पहली प्रीत की ख़ुशबू
इन आँखों में संजोने है.
कुछ गहरी मुलाकातें हैं
 बड़ी प्यारी सी बातें हैं 
चलो तो दूर तक साथी 
नहीं फिर वापस आतें हैं
तुम्हारा साथ है प्यारा
तुम्हारा प्यार है प्यारा.
बस तुम ही तुम निगाहों में 
समां जाओं इन बाहों में 
तुम्हे मैं कैद कर लूंगी
इन साँसों में समां लूंगी 
तुम्ही-तुम मेरी हस्ती पर 
तुम्ही-तुम दिल की  बस्ती पर 
बिना मांगे ही दे दूंगी 
तुम्हे अधिकार मैं सारा.
तुम मेरे पास आओ तो 
आकर मुझमे समाओ तो 
मैं दरिया बन तुम्हे अपने 
मन सागर में मिला लूंगी



पूर्णिमा त्रिपाठी
   

Monday, December 13, 2010

अंतहीन यात्रा

हुआ आरम्भ सिलसिला
एक अंतहीन सफ़र  का  
तुम  जो मिल गए अचानक   
पथिक  सहयात्री  बनकर  
जाने  क्यों  लगने  लगा  
जैसे  कि  तुम  चिरपुरातन  
संगी हो मेरे,काया बदल 
प्रगट हो गए हो अकस्मात्
तुम वही हो पथिक, जो
मेरी कल्पनाओं में 
सात समन्दरों के पार 
मेरे साथ कुलाचें भरता था .
तुम वही हो पथिक 
जो मेरी सोंच,मेरी आत्मा, 
मेरे मस्तिष्क को झिंझोड़  
सरसराती हवा की तरह 
निकल जाता था .
इस अंतहीन यात्रा में 
तुम इतने दिन तक 
कहाँ विश्राम  कर रहे थे 
मेरे सहचर ? आज | 
मेरे सामने खड़े हो 
मेरी सुप्त संवेदनाओं,
भावनाओं में प्राण फूंक दिए .
परन्तु  मैं विवश 
उस काया रहित
आत्मा की  भांति 
अप्रत्यक्ष तुम्हे चाह सकती हूँ 
जी सकती हूँ ,
अपना सर्वस्व अर्पण कर 
तुम्हें अनुभव कर सकती हूँ 
परन्तु हाय | नियति 
|प्रयत्यक्ष्तः तुम्हें अपने 
अंक में समाकर 
किसी वट - वृक्ष के तले 
अभिसार नहीं कर सकती .
तुम्हें इतनी शीघ्रता  क्यों थी ?
सहचर | क्यों थोड़ा पाने 
की चाह में अपना सबकुछ 
लुटा दिया? अब खाली हाथ |
कुछ देर प्रतीक्षा की होती 
मुझे समय लगा तुम्हारी
यात्रा को सरस बनाने में 
और तुम विकल, पहले ही 
पथ पर चल पड़े .
अब अचानक मिले हो 
तो थोड़ी देर ठहरो .
ठहर कर मेरे साथ चलो 
ताकि मैं भर सकूँ, 
अपना रीतापन 
तुम्हारे अस्तित्व  से.


पूर्णिमा त्रिपाठी

Thursday, December 2, 2010

समय की किताब से

चुन लेते हैं
हम कुछ यादें
समय की किताब से
परिस्कृत ,परिसज्जित
 प्रस्फुटित प्रफुल्लित   
अपने हिसाब से .
निकलता है जो तत्व
भेद  जाता है हृदय की 
सघन परतों को  
और बनता है 
एक इतिहास 
जो अदृश्य है 
परन्तु अविस्मर्णीय नहीं 
और तब घूमता है 
आँखों के समक्ष 
एक चलचित्र 
आदि से अंत तक 
जो कहता है 
एक नई कहानी 
तस्वीरों की जुबानी 
जो सिला देती हैं 
हमारी भीरुता का 
की हम कितने कायर हैं 
सह गए वो अन्याय 
इतनी सहजता से 
जो असहनीय था 
मान बैठे उसे 
कर्म की इतिश्री 
बस सोंचकर 
की जो होना है 
सो हो चुका
पर मत भूलो 
की वर्तमान 
कल का अतीत है 
और समय
 उसका साक्षी. 

पूर्णिमा त्रिपाठी  

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मै पूर्णिमा त्रिपाठी मेरा बस इतना सा परिचय है की, मै भावनाओं और संवेदनाओं में जीती हूँ. सामाजिक असमानता और विकृतियाँ मुझे हिला देती हैं. मै अपने देश के लोगों से बहुत प्रेम करती हूँ. और चाहती हूँ की मेरे देश में कोई भी भूखा न सोये.सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले ,और हर बेटी को उसके माँ बाप के आँगन में दुलार मिले.