Sunday, September 25, 2011

आतंकवाद से

यह जहर न जाने कितनी
बलियां और लेगा?
जाने कितनी माँ बहनों के
हृदय तडपायेगा.
कब तक होता रहेगा 
मानवता का नरसंहार ?
कब तक खंडित रहेगा 
मेरे स्वदेश का यह दुलार  
क्या कभी नहीं हो पायेगा
भाई का भाई से प्यार ?
क्या टुकडो  में बट जायेगी 
कश्मीरी सुषमा की बहार ?
क्यों प्यार बाटते हो सबका 
क्या तनिक भी तुमको क्षोभ नहीं ?
राम रहीम की वाणी क्या थी 
उसका कोई सोच  नहीं .
बंद करो यह भूल भुलैया 
झटको इन तुच्छ विचारों को 
यह सारा भारत अपना है 
मत सोचो देश बाटने को .
आतंकवाद की यह ज्वाला 
जैसे ही बुझ जायेगी 
भाईचारे से हर्षित हो 
यह वसुधा दीप जलायेगी .



पूर्णिमा त्रिपाठी

 

Thursday, February 17, 2011

प्रेम : एक अहसास

तू मेरी आँखों से देखे  
मैं तेरी  आँखों से देखूं
बड़ा ही प्यारा मंजर है 
जी चाहे दूर तलक देखूं .
सुहाने दिन, सुहानी रात
और सपने सलोने  हैं
वो पहली प्रीत की ख़ुशबू
इन आँखों में संजोने है.
कुछ गहरी मुलाकातें हैं
 बड़ी प्यारी सी बातें हैं 
चलो तो दूर तक साथी 
नहीं फिर वापस आतें हैं
तुम्हारा साथ है प्यारा
तुम्हारा प्यार है प्यारा.
बस तुम ही तुम निगाहों में 
समां जाओं इन बाहों में 
तुम्हे मैं कैद कर लूंगी
इन साँसों में समां लूंगी 
तुम्ही-तुम मेरी हस्ती पर 
तुम्ही-तुम दिल की  बस्ती पर 
बिना मांगे ही दे दूंगी 
तुम्हे अधिकार मैं सारा.
तुम मेरे पास आओ तो 
आकर मुझमे समाओ तो 
मैं दरिया बन तुम्हे अपने 
मन सागर में मिला लूंगी



पूर्णिमा त्रिपाठी
   

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मै पूर्णिमा त्रिपाठी मेरा बस इतना सा परिचय है की, मै भावनाओं और संवेदनाओं में जीती हूँ. सामाजिक असमानता और विकृतियाँ मुझे हिला देती हैं. मै अपने देश के लोगों से बहुत प्रेम करती हूँ. और चाहती हूँ की मेरे देश में कोई भी भूखा न सोये.सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले ,और हर बेटी को उसके माँ बाप के आँगन में दुलार मिले.